Atul Sharma
Director: Sankalp Samiti | Human Trafficking Rescue & Rehabilitation | Championing Education & Empowerment for Women & Children | Transforming Lives Through Rehabilitation Programs
Q1. What truly inspired you to begin this journey—was it motivation, a calling, or something more personal that pushed you into those difficult spaces?

पर न बचा पाने का गिल्ट। उस एक घटना ने भीतर ऐसा खालीपन छोड़ दिया जिसे अनदेखा करना संभव नहीं था। वही अपराधबोध मुझे उन बदनाम गलियों तक ले गया। मैं शायद खुद को माफ़ नहीं कर पा रही थी। उन गलियों में जाकर, उन जैसी अनेक बच्चियों को ढूँढकर और उन्हें बचाने की कोशिश करके, मैं अपने भीतर के उस बोझ से मुक्ति का रास्ता खोज रही थी। यह कोई योजनाबद्ध निर्णय नहीं था — यह भीतर की बेचैनी थी जिसने मुझे चैन से बैठने नहीं दिया। हर बचाई गई बच्ची, हर बदली हुई ज़िंदगी, मेरे लिए केवल एक सामाजिक कार्य नहीं था; वह मेरे अपराधबोध को थोड़ा हल्का करने का प्रयास था।
शायद यही मेरी यात्रा की असली शुरुआत थी — प्रेरणा से नहीं, बल्कि भीतर की टीस से।

Q2. What was the biggest challenge you faced in the early days, and how did you navigate through it?

शुरुआती दिन बेहद कठिन थे। हर कमरे के बाहर मुझे धक्के दिए गए। गालियाँ सुननी पड़ीं, अश्लील फब्तियाँ झेलनी पड़ीं। कई बार अपमान इतना तीखा होता था कि मन अंदर तक हिल जाता था। उन गलियों में एक बाहरी व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया जाना आसान नहीं था। वहाँ अविश्वास था, डर था, और एक गहरी असुरक्षा थी। धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि सीधे बदलाव की बात करना या किसी को वहाँ से निकालने की कोशिश करना संभव नहीं होगा। भरोसा जीतना ही पहला कदम था। तभी मुझे रास्ता दिखाई दिया — उनके बच्चों का भविष्य। मैंने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। शिक्षा के माध्यम से संवाद का एक दरवाज़ा खुला। जब महिलाओं ने देखा कि मेरा उद्देश्य सच्चा है, कि मैं उनके बच्चों के लिए खड़ी हूँ, तब धीरे-धीरे विश्वास बनने लगा। बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ मैं उन महिलाओं तक पहुँचने की कोशिश करती रही। शिक्षा मेरे लिए सिर्फ पढ़ाना नहीं थी — वह विश्वास का पुल था। उसी पुल ने आगे चलकर कई ज़िंदगियों के लिए बाहर निकलने का रास्ता बनाया।

Q3. As a woman entrepreneur, what unique strengths do you believe you bring to leadership?

मेरे नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत निडरता है। जब रास्ता कठिन होता है, जब परिस्थितियाँ डर पैदा करती हैं, तब भी मैंने पीछे हटना नहीं चुना। निडरता का मतलब लापरवाही नहीं होता, बल्कि अपने उद्देश्य पर अडिग रहना होता है। दूसरी सबसे बड़ी शक्ति है — परिवार का सहर्ष साथ। जब घर से विश्वास और समर्थन मिलता है, तो व्यक्ति आधी लड़ाई वहीं जीत लेता है। मेरे परिवार ने कभी मुझे रोका नहीं, बल्कि हर चुनौती में मेरे साथ खड़े रहे। यह भावनात्मक स्थिरता नेतृत्व को संतुलन देती है। और सबसे महत्वपूर्ण — मुझे अपनी ईमानदार कोशिश पर भरोसा है। मैं परिणाम की चिंता से ज्यादा अपने प्रयास की सच्चाई पर विश्वास करती हूँ। जब नीयत साफ हो और प्रयास सच्चा हो, तो रास्ते भले कठिन हों, लेकिन दिशा कभी गलत नहीं होती। शायद यही तीन बातें — निडरता, साथ और आत्मविश्वास — मेरे नेतृत्व की पहचान हैं।

Q4. Have you ever doubted yourself? What helped you move forward during difficult moments?

मैंने कभी खुद के प्रति संदेह महसूस नहीं किया। परिस्थितियाँ कठिन थीं, रास्ते चुनौतीपूर्ण थे, लेकिन भीतर कहीं एक स्पष्टता हमेशा बनी रही कि जो कर रही हूँ, वह सही है। असल में, उन बच्चियों और महिलाओं की पीड़ा ने मुझे रुकने ही नहीं दिया। उनका दर्द मेरे पैरों को थाम कर खड़ा रखता था। जब आप किसी की असहायता को इतने करीब से देखते हैं, तो वापसी का विचार मन में आता ही नहीं। पीछे हटना मानो उनके भरोसे को तोड़ना होता। मुझे लगता है, जब उद्देश्य व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से बड़ा हो जाता है, तब आत्म-संदेह की जगह दृढ़ता ले लेती है। मैंने रास्ते की मुश्किलों को देखा, लेकिन कभी मंज़िल पर सवाल नहीं उठाया। शायद यही कारण है कि मेरे लिए आगे बढ़ना एक विकल्प नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी था।

Q5. How do you balance ambition with personal life and well-being?

सच कहूँ तो यह मेरे लिए कभी प्रोफेशन नहीं रहा — यह मेरा पैशन है। और जब कोई काम आपके अस्तित्व का हिस्सा बन जाता है, तो “पर्सनल लाइफ” जैसी परिभाषाएँ पीछे छूट जाती हैं। उन मासूम चेहरों की व्यथा मेरे दिल में इस तरह बस गई कि चैन से बैठना संभव ही नहीं था। उनका दर्द, उनकी बेबसी, उनकी उम्मीद — यही मेरी दिनचर्या बन गई। कई बार लोगों ने पूछा कि मैं संतुलन कैसे बनाती हूँ, लेकिन मेरे लिए यह संतुलन का सवाल नहीं था; यह प्राथमिकता का सवाल था। जब उद्देश्य इतना गहरा हो, तो आराम, समय और निजी सीमाएँ खुद ही धुंधली हो जाती हैं। आज भी वही पीड़ा भीतर है — और शायद वही मुझे आगे बढ़ने की ऊर्जा देती है।
मेरे लिए यह काम और जीवन अलग-अलग नहीं हैं; यह एक ही यात्रा के दो नाम हैं।

Q6. What does “Give to Gain” mean to you in your professional journey?

मेरे लिए “Give to Gain” का अर्थ बहुत सीधा है — पहले देना, बिना किसी अपेक्षा के देना। मैंने प्यार दिया, सम्मान दिया, अपनापन दिया। बदले में कुछ पाने की इच्छा नहीं रखी, बस उनकी जिंदगी की विमुक्ति का रास्ता प्रभु से माँग लिया। जब आप किसी को इंसान होने का सम्मान देते हैं, तो वह सबसे बड़ी पूँजी होती है। कई बार समाज उनसे उनका आत्मसम्मान छीन लेता है। मैंने केवल वह लौटाने की कोशिश की। शायद यही मेरा देना था। और जो मिला — वह विश्वास था, आशीर्वाद था, और एक सुकून कि किसी की जिंदगी में थोड़ा उजाला आ सका। मेरे लिए “Gain” पैसा या पहचान नहीं है, बल्कि यह संतोष है कि मैंने अपने हिस्से का मानवीय कर्तव्य निभाया।

Q7. What is one mistake that taught you a powerful lesson?

मेरी सबसे बड़ी गलती शायद भरोसा करने की थी — सिस्टम पर, पुलिस पर। उस समय लगा था कि संस्थागत मदद से किसी की ज़िंदगी बेहतर दिशा में जा सकेगी। लेकिन परिणाम इसके विपरीत हुआ। जिस जीवन को नर्क से निकालने की कोशिश की थी, वह फिर उसी अंधेरे में गिर गया। वह क्षण मेरे लिए बहुत पीड़ादायक था। सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि मेरे विश्वास की भी परीक्षा थी। तब समझ आया कि हर सिस्टम संवेदनशील नहीं होता, और हर प्रक्रिया सुरक्षित नहीं होती। उसके बाद मैंने निर्णय लिया कि मैं अपनी लड़ाई अपने तरीके से लड़ूंगी। किसी बाहरी सहारे की अपेक्षा नहीं रखूंगी। उस गलती ने मुझे अधिक सजग, अधिक सतर्क और अधिक आत्मनिर्भर बना दिया। कभी-कभी एक गलती ही सबसे बड़ा शिक्षक बन जाती है।

Q8. How do you build and sustain a strong, supportive team?

मेरे लिए टीम सिर्फ सहयोगियों का समूह नहीं है — वह परिवार है। मैंने हमेशा अपने साथियों पर पूरा विश्वास किया है। जब आप किसी पर भरोसा करते हैं, तो वह जिम्मेदारी को अपने कर्तव्य की तरह निभाता है। सिर्फ काम में साथ देना ही काफी नहीं होता। मैंने उनके जीवन के सुख-दुख में भी सहभागिता की है। उनकी खुशियों में शामिल होना और मुश्किल समय में उनके साथ खड़े रहना — यही रिश्ता मजबूत करता है। शायद इसी वजह से मेरे वर्षों पुराने साथी आज भी मेरे साथ हैं। संबंध केवल लक्ष्य से नहीं, संवेदनशीलता से बनते हैं। विश्वास और सहभागिता ही किसी भी टीम की असली नींव होती है।

Q9. What advice would you give to young women aspiring to start their own venture?

मैं उन्हें बस एक ही बात कहूँगी — अपने लक्ष्य पर अर्जुन की तरह ध्यान केंद्रित रखें। जैसे महाभारत में अर्जुन ने केवल मछली की आंख देखी थी, उसी तरह आपको भी अपने लक्ष्य के अलावा कुछ और नहीं देखना चाहिए। रास्ते में शोर होगा, आलोचनाएँ होंगी, संदेह होंगे। लोग आपको भटकाने की कोशिश करेंगे। लेकिन अगर आपकी दृष्टि साफ है और आपका ध्यान लक्ष्य पर है, तो विचलन कम हो जाता है। सफलता उन लोगों को मिलती है जो बीच रास्ते में नजरें नहीं हटाते। दृढ़ता, धैर्य और स्पष्टता — यही आपकी असली ताकत है। अपने सपनों को छोटा मत कीजिए, बस अपनी नजरें लक्ष्य से हटने मत दीजिए।

Q10. In one sentence, how would you define success?

मेरे लिए सफलता वही है — जब आपका ध्यान अर्जुन के तीर की तरह सिर्फ मछली की आंख पर टिका रहे, और आप बिना भटके अपने लक्ष्य को साध लें।

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